वो मुलाकात™
वो पहली मुलाकात आखरी क्यों बन गयी |
जिन्दगी में मेरी उसकी यादें ही क्यों रह गयी ||
वो चले गये जिस राह पर
राह वही मंजिल मेरी क्यों बन गयी/ चलने को राह वही मुझे काँटे क्यों बिछा गयी |||||
वो चाँद से चेहरे की हँसी क्यों थम गयी |
वो मुस्कान गगन में क्यों खो गयी ||
ढुढ़ती रही हर पल ऩिगाहें उनकों
ना ज़ाने आँखे मेरी नम क्यों हो गयी ||||
वो बातें हवा में क्यों बह गयी |
वो प्यारी सी आवाज़ क्यों सहम गयी ||
किया था हौंसला मोहब्बतें इज़हार का
ज़बान मेरी कंठ में क्यों ठहर गयी ||||
वो नज़रे चुराना क्यों भुल गयी |
वो कज़री सी आँखें क्यों चमक गयी ||
चाहा था इसारों से समझाऩा उनकों
वो ऩैनों की ज़बान समझना क्यों भुल गयी ||||
वो केशुओं की घटाओं में क्यों उलझ़ गयी |
वो लटों में उंगलीयाँ फेरती क्यों रह गयी ||
कमाल तो चाँद भी था मगर
वो जुल्फों में चाँद से निराली क्यों बन गयी ||||
©-शुभम भण्ड़ारी
www.baaduli.blogspot.in
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